1997 में छात्र आंदोलन का नेतृत्व, 2026 में छात्रों के निशाने पर शिक्षा मंत्री: आखिर बदल क्या गया?
नई दिल्ली। देशभर में परीक्षा प्रणाली और कथित पेपर लीक को लेकर छात्रों का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। जंतर-मंतर पर कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे छात्र शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई, लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल के आरोपों ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है।
इस बीच वर्ष 1997 की एक पुरानी घटना फिर चर्चा में है। उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार, उस समय धर्मेंद्र प्रधान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के राष्ट्रीय सचिव थे और ओडिशा में कथित पेपर लीक के खिलाफ छात्र आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। उस आंदोलन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में उनके घायल होने की भी खबरें सामने आई थीं। उस समय छात्र आंदोलन को परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष के रूप में देखा गया था।
आज लगभग तीन दशक बाद परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब धर्मेंद्र प्रधान देश के शिक्षा मंत्री हैं और परीक्षा संबंधी विवादों को लेकर छात्र फिर सड़कों पर हैं। ऐसे में सोशल मीडिया, छात्र संगठनों और विपक्ष के कुछ नेताओं के बीच एक सवाल लगातार उठ रहा है—यदि 1997 में पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकार माना गया था, तो आज उसी तरह की मांग कर रहे छात्रों के आंदोलन पर पुलिस कार्रवाई क्यों हो रही है? क्या सत्ता बदलने के साथ विरोध प्रदर्शनों को देखने का नजरिया भी बदल गया है?
प्रदर्शनकारी छात्रों का आरोप है कि उनकी बात सुनने के बजाय उन पर बल प्रयोग किया गया। उनका कहना है कि लाठीचार्ज और आंसू गैस जैसी कार्रवाई ने छात्रों में भय का माहौल पैदा किया है। दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है और कार्रवाई उसी उद्देश्य से की गई।
यह मुद्दा अब केवल एक परीक्षा विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। यह लोकतांत्रिक विरोध, छात्र अधिकार, परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और सरकार की जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है। एक ओर सरकार सुधारों और कानून-व्यवस्था की बात कर रही है, तो दूसरी ओर छात्र पूछ रहे हैं कि उनकी आवाज़ आखिर किस मंच पर सुनी जाएगी।
फिलहाल इस पूरे मामले पर राजनीतिक बयानबाजी जारी है और विभिन्न मामलों पर न्यायिक एवं प्रशासनिक प्रक्रियाएँ भी चल रही हैं। ऐसे में अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।





