केन–बेतवा परियोजना पर बवाल: ‘विकास’ के लिए डूबेंगे गांव, हजारों लोगों ने शुरू किया आंदोलन
छतरपुर/पन्ना |
बुंदेलखंड को पानी देने के लिए बनाई जा रही केन–बेतवा लिंक परियोजना अब विवादों के केंद्र में आ गई है। दौधन बांध के निर्माण के साथ ही हजारों लोगों के विस्थापन का खतरा गहराने लगा है, जिसके विरोध में अप्रैल 2026 से ग्रामीणों ने आंदोलन शुरू कर दिया है।
22 गांव प्रभावित, 10 पूरी तरह डूब क्षेत्र में
परियोजना के पहले चरण में मध्य प्रदेश के पन्ना और छतरपुर जिलों के करीब 22 गांव प्रभावित हो रहे हैं। इनमें से लगभग 10 गांव पूरी तरह जलमग्न हो जाएंगे।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब 7,000 से अधिक परिवार इस परियोजना से प्रभावित हैं, जिनकी आबादी 30 हजार से ज्यादा बताई जा रही है।
आदिवासी समुदाय पर सबसे ज्यादा असर
प्रभावितों में बड़ी संख्या गोंड और सौर आदिवासी समुदाय की है। इनकी आजीविका खेती, जंगल और पशुपालन पर आधारित है।
ग्रामीणों का कहना है कि विस्थापन के बाद वे अपनी जमीन के साथ-साथ अपनी संस्कृति और पहचान भी खो देंगे।
5 अप्रैल से शुरू हुआ आंदोलन, महिलाओं ने संभाली कमान
विस्थापन के विरोध में 5 अप्रैल से केन नदी किनारे ग्रामीणों ने प्रदर्शन शुरू किया।
आंदोलन ने 8 अप्रैल को तब नया रूप ले लिया जब महिलाओं ने ‘चिता आंदोलन’ शुरू किया। इसमें वे प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर विरोध जता रही हैं।
इसके अलावा ग्रामीणों ने जल सत्याग्रह, चूल्हा बंद और मिट्टी सत्याग्रह जैसे तरीकों से भी विरोध दर्ज कराया।
ग्रामीणों की मुख्य मांग: जमीन के बदले जमीन
प्रदर्शनकारियों की सबसे बड़ी मांग है कि उन्हें केवल नकद मुआवजा नहीं, बल्कि जमीन के बदले जमीन दी जाए।
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार द्वारा दिया जा रहा ₹12.5 लाख प्रति वयस्क मुआवजा उनकी जमीन और भविष्य के लिए पर्याप्त नहीं है।
सरकार बोली—बुंदेलखंड को मिलेगा पानी और बिजली
सरकार का दावा है कि ₹44,605 करोड़ की इस परियोजना से बुंदेलखंड के लाखों लोगों को सिंचाई और पीने का पानी मिलेगा, साथ ही बिजली उत्पादन भी होगा।
प्रशासन ने 16 अप्रैल को प्रदर्शनकारियों को आश्वासन दिया कि नए सिरे से सर्वे किया जाएगा और मुआवजे की विसंगतियों को दूर किया जाएगा। इसके बाद आंदोलन को 10 दिनों के लिए स्थगित किया गया।
पन्ना टाइगर रिजर्व पर भी खतरा
परियोजना का असर केवल गांवों तक सीमित नहीं है। दौधन बांध बनने से पन्ना टाइगर रिजर्व के हजारों हेक्टेयर जंगल के डूबने की आशंका है, जिससे वन्यजीवों पर भी खतरा मंडरा रहा है
भरोसे का संकट: ग्रामीण बोले—पहले भी नहीं मिला न्याय
ग्रामीणों का कहना है कि देश की कई बड़ी परियोजनाओं में विस्थापितों को आज तक पूरा पुनर्वास नहीं मिला।
इसी वजह से उन्हें डर है कि कहीं इस बार भी उनके साथ अन्याय न हो जाए।
आगे क्या?
फिलहाल ग्रामीण प्रशासन के आश्वासन के बाद सर्वे रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं।
हालांकि चेतावनी दी गई है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
निष्कर्ष
केन–बेतवा लिंक परियोजना एक तरफ जहां विकास की उम्मीद जगाती है, वहीं दूसरी ओर हजारों लोगों के जीवन पर संकट भी खड़ा कर रही है।
अब देखना होगा कि सरकार विकास और मानवता के बीच संतुलन कैसे बनाती है।





