भारत के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर इस वर्ष अल नीनो का असर गहराने की आशंका बढ़ गई है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने संकेत दिया है कि प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल नीनो परिस्थितियां मॉनसून के दौरान और मजबूत हो सकती हैं। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार अल नीनो आमतौर पर भारत में सामान्य से कम वर्षा, अधिक गर्मी और लंबे शुष्क दौर का कारण बनता है।

केंद्र सरकार ने संभावित खतरे को देखते हुए देश के 197 जिलों को विशेष रूप से संवेदनशील श्रेणी में रखा है। इन जिलों के लिए अलग-अलग राज्यवार और फसलवार आकस्मिक योजनाएं तैयार की गई हैं ताकि कम वर्षा की स्थिति में किसानों को नुकसान से बचाया जा सके।

आईएमडी के नवीनतम पूर्वानुमान के अनुसार वर्ष 2026 में देश में जून से सितंबर के बीच होने वाली मॉनसूनी वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) का लगभग 90 प्रतिशत रह सकती है। मौसम विभाग ने सामान्य से कम बारिश की संभावना अधिक बताई है। शुरुआती जून में भी देशभर में वर्षा सामान्य से काफी कम दर्ज की गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अल नीनो प्रभाव लगातार मजबूत होता है तो खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित हो सकती है। धान, सोयाबीन, कपास, दालें और अन्य वर्षा आधारित फसलें सबसे अधिक जोखिम में रहेंगी। इसके अलावा जलाशयों में पानी की उपलब्धता कम होने, भूजल पर दबाव बढ़ने और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि की आशंका भी जताई जा रही है।

मौसम विभाग के अनुसार मध्य भारत, मॉनसून कोर जोन और कई कृषि प्रधान क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है। वहीं कुछ इलाकों में ही सामान्य या उससे अधिक बारिश देखने को मिल सकती है।

सरकार ने राज्यों को सलाह दी है कि वे जल संरक्षण, वैकल्पिक फसलों के चयन और सिंचाई प्रबंधन की तैयारियां पहले से पूरी रखें। कृषि मंत्रालय भी किसानों को समय-समय पर मौसम आधारित सलाह जारी कर रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले सप्ताह मॉनसून की दिशा और अल नीनो के प्रभाव को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे। यदि प्रशांत महासागर का तापमान और बढ़ता है तो इसका सीधा असर भारत की कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण क्षेत्रों पर दिखाई दे सकता है।