नई दिल्ली। Supreme Court of India ने सोमवार को UAPA (अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट) मामलों में जमानत को लेकर अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि “बेल नियम है और जेल अपवाद”, यह सिद्धांत गंभीर कानूनों वाले मामलों में भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने एक UAPA आरोपी को करीब छह साल जेल में रहने के बाद जमानत देते हुए कहा कि लंबा ट्रायल और अनिश्चितकाल तक हिरासत किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि निचली अदालतों को जमानत पर फैसला करते समय केवल आरोपों की गंभीरता ही नहीं, बल्कि ट्रायल की स्थिति और आरोपी के अधिकारों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने अपने ही पुराने फैसलों के संदर्भ में भी टिप्पणी की। विशेष रूप से Umar Khalid को जमानत न देने वाले फैसले को लेकर कोर्ट ने कहा कि कुछ मामलों में जमानत के लिए जरूरत से ज्यादा कठोर मानदंड अपनाए गए प्रतीत होते हैं।
कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद UAPA कानून के तहत गिरफ्तारी और लंबी न्यायिक हिरासत को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह टिप्पणी भविष्य के UAPA मामलों में जमानत सुनवाई को प्रभावित कर सकती है। वहीं, कुछ लोग राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सख्त रवैया बनाए रखने की जरूरत भी बता रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी दोहराया कि किसी आरोपी को ट्रायल पूरा होने से पहले अनिश्चित समय तक जेल में रखना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ माना जा सकता है।





