“ना” क्या शादी के बाद अपनी अहमियत खो देती है?

भारत में मेरिटल रेप यानी शादी के भीतर बिना सहमति बनाए गए शारीरिक संबंधों को लेकर बहस लगातार तेज होती जा रही है। समाज में आज भी बड़ी संख्या में लोग यह मानते हैं कि विवाह के बाद पत्नी की सहमति स्वतः स्थायी हो जाती है, जबकि महिलाओं के अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञ इसे मानवाधिकार और सम्मान के खिलाफ मानते हैं।

WHO और NFHS-5 जैसी रिपोर्ट्स के अनुसार, बड़ी संख्या में विवाहित महिलाएं अपने ही पार्टनर द्वारा शारीरिक या मानसिक हिंसा का सामना करती हैं, लेकिन अधिकांश मामले कभी रिपोर्ट नहीं हो पाते। इसके पीछे सामाजिक दबाव, शर्म, परिवार टूटने का डर और “एडजस्ट करो” जैसी सोच को जिम्मेदार माना जाता है।

भारत में वर्तमान कानून के अनुसार, विवाह के भीतर हुए गैर-सहमति संबंधों को रेप की श्रेणी में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है। इसी कानूनी अपवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से बहस जारी है। कई याचिकाओं में यह तर्क दिया गया है कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के खिलाफ है, जो समानता, स्वतंत्रता और गरिमा की बात करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा केवल कानून का नहीं बल्कि सामाजिक मानसिकता का भी है। बचपन से महिलाओं को “समझौता” करना सिखाया जाता है, जिसके कारण कई बार वे अपने साथ हो रहे शोषण को भी सामान्य मानने लगती हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे “लर्न्ड हेल्पलेसनेस” और “गैसलाइटिंग” जैसे मनोवैज्ञानिक प्रभावों से जोड़ते हैं।

दुनिया के कई देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और नेपाल में विवाह के भीतर बिना सहमति संबंधों को अपराध माना जा चुका है। वहीं भारत में यह मुद्दा अब भी कानूनी और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या का समाधान केवल सख्त कानून नहीं, बल्कि जागरूकता, शिक्षा, पारिवारिक संवाद और महिलाओं के लिए मजबूत सपोर्ट सिस्टम से संभव है। कंसेंट को हर रिश्ते की बुनियादी शर्त के रूप में समझना समाज के लिए जरूरी बताया जा रहा है।